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आज़मगढ़: ‘कागज’ में दिखेगी आजमगढ़ के मृतक की कहानी


लाल बिहारी की भूमिका में नजर आएंगे अभिनेता पंकज त्रिपाठी

डिजिटल प्लेटफार्म के साथ थियेटरों में भी चल रही प्रदर्शन की तैयारी

आजमगढ़ : सतीश कौशिक निर्देशित फिल्म ‘कागज’ जल्द ही दर्शकों के बीच होगी। कहानी जिले के लालबिहारी मृतक के जीवन पर आधारित है जिन्होंने कागजों में जिंदा होने के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया। उसके बाद अब अन्य कागजी मृतकों को न्याय दिलाने के लिए लगे हुए हैं। फिल्म में लालबिहारी की भूमिका में अभिनेता पंकज त्रिपाठी पर्दे पर नजर आएंगे।
फिल्म के बारे में सतीश कौशिक का कहना है कि सच्ची कहानी पर आधारित फिल्में अब कम देखने को मिलती हैं। मुझे लालबिहारी के बारे में जानकारी हुई तो फिल्म बनाने का फैसला वर्ष 2003 में ले लिया। इसके मुख्य सह निर्देश खुद लालबिहारी के पुत्र विजय भारत हैं। डिजिटल प्लेटफार्म पर फिल्म के प्रदर्शन के पीछे मकसद यह कि पूरी दुनिया इसे देख सकेगी। साथ ही उत्तर प्रदेश के कम से कम 20 सिनेमा घरों में इसके प्रदर्शन की योजना है। कुछ कारणों से फिल्म की शूटिंग आजमगढ़ में न कराकर सीतापुर में की गई। मोबाइल पर बातचीत में निर्देशक सतीश कौशिक ने बताया कि लालबिहारी के बारे में कई बार खबरें पढ़ने के बाद उनसे मिलने की इच्छा हुई और उनसे मिलकर अपनी मंशा जाहिर की। लालबिहारी ने सहमति दे दी तो काम शुरू हो गया। अब फिल्म बनकर तैयार है। फिल्म को सलमान खान की कंपनी प्रस्तुत कर रही है।

कागजों में मुर्दा घोषित लालबिहारी 18 वर्षों के संघर्ष के बाद जिंदा हुए

मुबारकपुर क्षेत्र के अमिलो गांव निवासी लाल बिहारी का जन्म 1955 में मूल घर निजामाबाद तहसील के खलीलाबाद में हुआ था। बचपन में पिता ही पिता चौथी राम का साया सिर से उठ गया तो उनका पालन-पोषण अमिलो स्थित ननिहाल में हुआ। बड़े हुए तो हथकरघा के लिए लोन लेने बैंक पहुंचे। बैंक ने सर्वे कराया तो पता चला कि 30 जुलाई 1976 में कागजों में मृत घोषित कर दिया गया है। कार्यालयों का चक्कर लगाते-लगाते परेशान हो गए थे। उसके बाद तो उन्होंने अपनी बात रखने का दूसरा और नायाब तरीका तलाश किया। नौ सितंबर 1986 को तत्कालीन मुख्यमंत्री वीपी सिंह के कार्यकाल में विधानसभा में अपनी बात लिखा पर्चा का गोला बनाकर फेंका। मार्शल ने चार-पांच घंटे बाद छोड़ा। इसके बाद तो लालबिहारी ने अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए लोकसभा और विधानसभा का चुनाव लड़ने की ठान ली। 18 वर्ष संघर्ष करने के बाद 30 जून 1994 को जिला प्रशासन ने तहसील के अभिलेखों में पुन: नाम दर्ज कर जीवित कर दिया है। इसी के बाद राष्ट्रीय मृतक संघ की स्थापना की। अब तक अपने जैसे काफी संख्या में लोगों को अभिलेखों में जिंदा करा चुके हैं।

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रिपोर्ट आज़मगढ़ लाइव

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