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नहीं करते धर्म,जाति की ओछी राजनीति, समाजवादी पार्टी पहले अपने आप को देखे -राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल

राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल ने सरायमीर में हुई तोड़ फोड़ की कड़े शब्दों में निंदा की
जो हुआ वो किसी के लिए अच्छा नहीं है ,प्रशासन करे सख्त कार्यवाही  - शकील अहमद 

आज़मगढ़: सरायमीर में हुए बवाल के बाद जिले में राजनितिक पारा चढ़ सा गया है, सपा जिलाध्यक्ष द्वारा बवाल में राष्ट्रिय उलेमा कौंसिल की तरफ इशारा करने के बाद राष्ट्रिय उलेमा कौंसिल ने भी जवाब देना शुरू कर दिया है। प्रेस को जारी बयान में  राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल ने सरायमीर में हुई तोड़ फोड़ की कड़े शब्दों में निंदा की है। कौंसिल के जिलाध्यक्ष शकील अहमद ने प्रेस को जारी बयान में कहाकि ये ज़िले की अवाम के लिए सबक़ है कि कैसे फेसबुक पे लिखी एक नफरत और धार्मिक भावनाओं को ठेंस पहुंचाने वाली पोस्ट से पूरे क़स्बे के अमन चैन में खलल पड़ गया इसलिए हम सोशल मीडिया के सही इस्तेमाल पर ज़ोर दें और किसी को इसका इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए न करने दें। जनपद के मज़बूती इसका साम्प्रदायिक सौहार्द और भाईचारा है जिसे किसी भी कीमत पर कमज़ोर नही होने देंगे। उन्होंने कहाकि 27 अप्रैल को जब अमित साहू की धार्मिक भावनाओं को ठेंस पहुंचाने वाली पोस्ट सामने आई, पार्टी के लोगों ने तत्काल प्रशासनिक अफसरों से बात की और सुसंगत धाराओं में मुक़दमा लिखा गया। नबी की शान में गुस्ताखी क़ाबिल ए बर्दाश्त नही है पर क़ानूनी लड़ाई क़ानूनी ढंग से लड़नी होती है। इसके बाद कुछ लोगों ने अभियुक्त पर रासुका लगाए जाने की मांग की जिस पर उच्च अधिकारियों से चर्चा करने की बात हुई थी और अधिकारियों का आश्वासन भी मिला था। परंतु अगले दिन यानी कि 28 अप्रैल को कुछ अति उत्साहित लोग कुछ राजनैतिक आकाओं के इशारे पर राजनैतिक स्वार्थ के लिए एक गहरी साजिश के तहत सुनियोजित ढंग से आम भोले भाली अवाम के जज़्बात को भड़का कर उन्हें थाना घेरने लेकर पहुंच गए और वहाँ ज़बरदस्ती थानेदार से रासुका लगाए जाने की ज़िद करने लगे जबकि रासुका की कार्यवाही ज़िला स्तर के अधिकारियों को तमाम कागज़ी खानापूर्ति और सैंक्शन लेने के बाद करनी होती है। परंतु भीड़ को बरगला कर हालात बेकाबू कर दिए गए और फिर जो हुआ वो न ज़िले के लिए अच्छा है न अवाम के लिए और न ही उस नबी को पसंद आएगा जिसके हम मानने वाले हैं। कहीं न कहीं लोकल थाना और इंटेलिजेंस की चूक रही कि वो वक़्त रहते इस षड्यंत्र को समझ न सकी और हालात को बेकाबू होने से रोक न पाई। हम प्रशासन से मांग करते हैं कि इस साजिश को रचने वालों और तोड़ फोड़ करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही होनी चाहिये पर ख्याल रहे कि किसी बेगुनाह को इसकी सज़ा न मिले क्योंकि धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ मामला होने के कारण आम लोगों का इकठ्ठा होना भी स्वाभाविक है।
इस सन्दर्भ में सपा ज़िला अध्यक्ष द्वारा राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल को घटना का जिम्मेदार बताय जाने वाले बयान पर शकील अहमद ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की और कहा कि ये तो बिल्कुल वैसे है कि "उल्टा चोर कोतवाल को डांटे"। सपा और उसके नेताओं ने हमेशा धर्म-जाति, दंगे-फसाद की गन्दी राजनीत की है और आज भी उसी का सबूत दे रहे हैं। कल के पूरे प्रकरण में ओलमा कौंसिल का न कोई लीडर वहां मौजूद था न ही घटना से हमारा कोई लेना देना है। उन्होंने सवाल उठाया की सपा के एक मौजूदा विधायक और एक पूर्व विधायक वहां मौके पे क्या करने गए थे?
दावा किया की राष्ट्रीय ओलमा कौंसिल धर्म, जाती और सम्प्रदाय की ओछी राजनीत नही करती बल्कि हम ज़ुल्म के खिलाफ मज़लूमों की एक मजबूत लोकतांत्रिक राजनैतिक आवाज़ हैं जिसे सपा जैसे तथाकथित सेकुलर दल बर्दाश्त नही कर पा रहे हैं।

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रिपोर्ट आज़मगढ़ लाइव

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