आजमगढ़। लोक मनीषा परिषद के तत्वावधान में महर्षि बाल्मीकि जयन्ती गत वृहस्पतिवार को देर सायंकाल राहुल नगर स्थित पं. अमरनाथ तिवारी के आवास पर श्रद्धा पूर्वक मनायी गयी। इस अवसर पर एक संगोष्ठी भी आयोजित हुई, जिसमें बाल्मीकीय रामायण के काव्य रचना पर चर्चा की गयी और विष्व कवि की संज्ञा दी गयी। संगोष्ठी की अध्यक्षता पं. अमरनाथ तिवारी एवं संचालन जनमेजय पाठक ने किया। गोष्ठी का षुभारम्भ करते हुए संस्था के अध्यक्ष श्री जनमेजय पाठक ने कहा कि महर्षि बाल्मीकि महर्षि कष्यप् और अदिति के नौवें पु़त्र थे। प्रारम्भिक नाम इनका वरूत था। इन्हें प्राचेतस का नाम दिया गया था। घोर तपस्या के कारण कालान्तर में इन्हें महर्षि बाल्मीकि कहा गया। इनकी लोक प्रसिद्धि संस्कृत के प्रथम महाकाव्य ‘रामायण’ की रचना से हुयी। दुःखद है कि इनके नाम से एक जाति विषेष का नामकरण किया गया और उन्हें षुद्र माना गया। इस अवसर पर उ.प्र. सेवानिवृत्त माध्यमिक षिक्षक एसोसिएषन के महामंत्री श्री विजयधारी पाण्डेय ने श्रीमद् बाल्मीकीय रामायण को विष्व का प्रथम महाकाव्य बतलाया और महर्षि बाल्मीकि को विष्व का प्रथम कवि। श्री पाण्डेय बताया कि काव्य की मूल आत्मा ‘वेदना’ को आधार बना कर महाकवि बाल्मीकि ने अपने युगान्तर काव्य ‘रामायण’ की रचना की है। अध्यक्षता करते हुए श्री अमरनाथ तिवारी ने बाल्मीकीय रामायण के काव्य पक्ष पर विषेष रूप से चर्चा की और कहा कि वेदना ही काव्य का प्रारम्भ होती है। कामरत क्रौंच पक्षियों में एक को मारना और दूसरे को छटपटाते देख महाकवि बाल्मीकि को जो वेदना हुयी थी, उसी का प्रतिफल श्रीमद् बाल्मीकीय रामायण है। इस संगोष्ठी को सर्वश्री निषीथ रंजन तिवारी, रत्नाकर दुबे, गणेष विष्वकर्मा आदि वक्ताओं ने सम्बोधित किया।
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