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आजमगढ़ के आंधीपुर से उठी समाजवाद की आंधी थमी , रामनरेश की जीवन यात्रा पर एक नजर


आजमगढ़। आखिर मंगलवार को आज़मगढ़ के फूलपुर के गांव आंधीपुर से उठी समाजवादी राजनीति की बेमिसाल आंधी बाबूजी रामनरेश यादव के निधन से थम गयी। राम नरेश जी के राजनितिक सफर पर नजर डाले तो यह अहसास होगा की केवल समाज सेवा और मधुर व्यवहार की परिपाटी पर चलते इस व्यक्ति ने जिन उचाईयों को छुआ वह पहले और आज के दौर में आसान नहीं है। किसान परिवार में जन्में रामनरेश यादव बचपन से ही सरल स्वभाव के रहे। उन्होंने मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेने के बाद भी समाजवादी आंदोलन से सत्ता तक का सफर पूरा किया। इस दौरान उन्हें कई बार असफलता का भी सामना करना पड़ा लेकिन स्वभाव के अनुरूप वे कभी विचलित नहीं हुए, बल्कि संघर्ष करते रहे। जनपद के फूलपुर तहसील क्षेत्र के आंधीपुर गांव निवासी रामनरेश यादव का जन्म 1928 में हुआ था। पिता गया प्रसाद यादव प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक थे। पांच -बहनो में सबसे बड़े रामनरेश यादव शुरू से ही प्रतिभाशाली थे। इन्होंने हाईस्कूल की शिक्षा शहर के वेस्ली इंटर कालेज से प्राप्त की। इंटरमीडिएट वाराणसी से किया। इसके बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय से बीए, एमए व एलएलबी की डिग्री प्राप्त की। शिक्षा के दौरान वे आचार्य नरेन्द्र देव के नेतृत्व में लगातार समाजवादी आंदोलन से जुड़े रहे। प्रतिज्ञा ही थी कि शिक्षा पूरी होते ही वर्ष 1947 में इन्हें एंग्लो बंगाली इंटर कालेज वाराणसी में हिंदी प्रवक्ता की नौकरी मिल गयी लेकिन वे अपने दिल से समाजसेवा की भावना को नहीं निकाल सके और नौकरी छोड़ 1953 में आज़मगढ़ में वकालत शुरू कर दी। वर्ष 1962 में सगड़ी विधानसभा क्षेत्र से पहली बार चुनाव लड़े लेकिन सफलता नहीं मिली। 1967, 69 और 74 के चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी ने इन्हें टिकट नहीं दिया। फिर भी ये विचलित नहीं हुए बल्कि जिला मंत्री पद पर रहते हुए पार्टी को अपनी सेवाएं देते रहे। वर्ष 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव जीतने के बाद वह कभी पीछे मुड़कर नहीं देखे। एटा जनपद से विधयक बनने के बाद 23 जून 1977 को इन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। वे जिले को यह गौरव दिलाने वाले पहले जनप्रतिनिधि बने। 26 अगस्त 2011 को इनको मध्यप्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। वे जिले के पहले व्यक्ति बने जिन्होंने इस पद को सुशेभित किया। राज्यपाल रहते हुए वे सरकार के कदम से कदम मिलाकर चले। वर्ष 2014 में भजपा की केंद्र की सत्त्ता ने के बाद माना जा रहा था कि इन्हें अन्य राज्यपालों की तरह इन्हें भी हटा दिया जायेगा लेकिन इनकी स्वच्छ और ईमानदार छवि ही थी कि राज्यपाल बने रहे। इस दौरान इनका नाम व्यापम घोटाले में घसीटा गया। इसी मामले में पुत्र की मौत ने इन्हें तोड़ दिया था। इस दुःख को सहते हुए वह अपना कर्तव्य निभाते रहे इसी बीच पत्नी की मौत का झटका भी उन्हें लगा।अब पूर्व राज्यपाल रामनरेश यादव का निधन भारतीय राजनीति में बचे पुरानी परंपरा के नेताओ की अपूरणीय क्षति मानी जा रही है। 

शून्य से शिखर तक रामनरेश का सफर.जन्म .1 जुलाई 1928 को फूलपुर तहसील केआंधीपुर गांव के शिक्षक परिवार में हुआ था । अपने राजनीकतिक कार्यकाल के दौरान स्वर्गीय रामनरेश वर्ष 1988 में जनता पार्टी के टिकट पर राज्यसभा सदस्य भी चुने गये। कार्यकाल 1994 तक रहा।.वह वर्ष 1996 में कांग्रेस के टिकट पर फूलपुर विधानसभा से चुनाव लड़कर विधायक बने।.वर्ष 1999 में आजमगढ़ संसदीय क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन चौथे स्थान पर रहे।.वर्ष 2002 में फूलपुर विधानसभा क्षेत्र से लगातार दूसरी बार विधायक चुने गये।.वर्ष 2007 में फूलपुर विधानसभा से चुनाव लड़े लेकिन इन्हें तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा। जीत सपा प्रत्याशी व भाजपा सांसद के पुत्र अरुणकांत यादव की हुई।.वर्ष 2010 में कांग्रेस के केन्द्रीय चुनाव समिति के सदस्य बनाये गये। .26 अगस्त 2011 को इन्हें मध्यप्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। उन्होंने मंगलवार सुबह लखनऊ पीजीआई में अंतिम सांस ली। आपको बता दें कि पीजीआई में उनका लंबे समय से इलाज चल रहा था। बताते हैं कि राम नरेश यादव सज्जन और समाजवादी विचारधारा के धनी थे और वो समाजवादी दिग्गज राजनारायण के साथी थे।




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रिपोर्ट आज़मगढ़ लाइव

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