आजमगढ़। नगर के विट्ठल घाट स्थित अति प्राचीन गुरूद्वारा में रविवार को सिख धर्म के प्रवर्तक गुरू नानक देव का प्रकाशोत्सव श्रद्वा पूर्वक मनाया गया। गुरू ग्रन्थ साहब जी की छत्र छाया में कीर्तन दरबार सजाया गया जिसमें ज्ञानी सुनील सिंह एवं रागतों द्वारा कीर्तन भजन के साथ वारियों का पाठ किया गया। सुबह हुए 5 वारियों के पाठ में सभी सिख संगतों एवं धर्म प्रेमियों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। दरबार में अरदास के बाद कड़ाह प्रसाद व लंगर का वितरण किया गया। गुरूजी का आर्शीवाद लेकर संगते निहाल हुई। प्रकाशोत्सव में गुरूनानक देव के जीवन वृत्त एवं कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया गया कि गुरू नानक देव का जन्म सन् 1469 में 20 नवम्बर को कार्तिक पूर्णिमा के दिन तलवंडी ननकाना साहिब में कालू मेहता जी के घर हुआ था। बचपन से ही उनमें धार्मिक गुण थे। पिता द्वारा दिये गये 20 रुपये में भी साधू संतों को भोजन कराकर लंगर की प्रथा शुरू की जो आज भी सभी गुरूद्वारा में चल रही है। वे अमीर गरीब में भेद नहीं रखते थे। उनके लिए सभी समान थे और वह सभी धर्माें का आदर करते थे। वे भेद भाव , छुआछुत, अंधविश्वास, पाखण्ड के घोर विरोधी थे। उन्होंने ईश्वर का ध्यान सिमरन दिल से करने का उपदेश दिया। गुरूनानक देव जी ने जयजी साहिब, सोदर, आरती, रामकली, आसादीवार, बारहमाह वारियों की रचना की। प्रकाशोत्सव में सुरेन्द्र सिंह, संग्राम अरोरा, राजेश अरोरा, सतनाम सिंह, श्याम सुन्दर, करतार सिंह, गुरू चरण लाल व सिंधी समाज के लोग भी भारी संख्या में उपस्थित रहे।
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