आजमगढ़ :: प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में 3 जून और आजमगढ़ का महत्व विषय पर एक विचार गोष्ठी नेहरू हाल में सम्पन्न हुयी ,जिसमें स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को क्रान्तिकारी श्रद्धांजलि दी गयी और उनके त्याग ,बलिदान व संघर्ष पर गम्भीर चिन्तन हुआ। विषय प्रवर्तन करते हुए कन्हैयालाल यादव ने कहा कि मेरठ से उठने वाली प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की लहर ने दिल्ली से लेकर आजमगढ़ तक को उद्वेलित कर दिया। आजमगढ़ में 3 जून 1857 को क्रान्तिकारियों ने जेल के फाटक को तोड़कर अपने साथियों व बन्द कैदियों को आजाद कराया। 7 लाख का अंग्रेजी खजाना लूट लिया। यहाॅ लड़ाई का मुख्य केन्द्र जिला मुख्यालय से लेकर मन्दुरी ,अतरौलिया ,कोयलसा ,मेघई सहित जिले के विभिन्न हिस्से रहे।
डा0रविन्द्रनाथ राय ने कहा कि आजमगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने आजमगढ़ को 3 बार ,3 जून 1857 से 25 जून 1857 ,18 जुलाई 1857 से 26 अगस्त 1857 तथा 25 मार्च 1858 से 15 अप्रैल 1858 तक अर्थात कुल 81 दिन कम्पनी राज से आजाद कराया था। इसी से प्रभावित होकर वीर कुॅवर सिंह आजमगढ़ आजादी की लड़ाई में आये थे।
स0पा0जिलाध्यक्ष हवलदार यादव ने कहा कि आजमगढ़ की आज्ञप्ति पूरे देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में सबसे अच्छी मानी जाती है। क्योंकि इतिहासकारों ने इसे हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए पथ प्रदर्शक बताया है। 1857 में जाति-धर्म ,भाषा व क्षेत्र से उपर उठकर कम्पनी के खिलाफ जंग-ए-आजादी में देश के लोगों ने भाग लिया था। उस एकता से ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक्ति की चूले हिल गयी थीं और कम्पनी राज की जगह ब्रिटिश राजसत्ता को भारत की कमान सम्भालनी पड़ी। फिर भी भविष्य में ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ बढ़ते आक्रोश ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबुर किया। डा0राजाराम सिंह ने 1857 के इतिहास से प्रेरणा लेने की बात कही।
विधायक आलमबदी आजमी ने आजमगढ़ के अवाम से अपील की कि हम लोग हिन्दू-मुस्लिम एकता को कायम रखते हुए ही 1857 की प्रासंगिकता को सिद्ध कर पायेंगे। उन्होंने कहा कि यदि हम इस एकता से हट जायेंगे तो हम इंसानियत से भी हट जायेंगे। डा0वी0एन0गोंड़ ने 3 जून और आजमगढ़ के 3 बार की आजादी पर प्रकाश डाला।
ऊमैर सिद्धिकी ने कहा कि 1857 की हिन्दू-मुस्लिम एकता की परम्परा को साम्प्रदायिक साम्राज्यवादी व फासिस्ट शक्तियां लगातार तोड़ने का प्रयास कर रहीं हैं। जो देश व समाज के विकास के उन्नति के लिए घातक है। इसीलिए आज के दौर में 1857 को याद करना हमारे लिये अधिक प्रासंगिक है। गोष्ठी को अध्यक्ष मण्डल के साथी कन्हैयालाल ,श्रीराम सिंह ,डा0सोनी पाण्डेय ,डा0राजाराम सिंह तथा डा0अलाउद्दीन ,का0हरिमंदिर पाण्डेय ,ओमप्रकाश सिंह ,सुबेदार यादव ,रामसम्हार ,का0जयप्रकाश नरायन आदि वक्ताओं ने सम्बाधित किया।
गोष्ठी के प्रारम्भ में विजय यादव ने अजीमुल्लाह साहब द्वारा लिखित राष्ट्रगीत प्रस्तुत किया तथा करीम आजाद ,का0बैजनाथ ,तेबहादुर व हरिकेश यादव ने 1857 पर आधारित क्रान्तिकारी गीत प्रस्तुत किये।
गोष्ठी का संचालन डा0रविन्द्र नाथ राय ने किया।


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