आजमगढ़ : कई हिट फिल्मों के निर्माता सतीश कौशिक सच्ची घटना पर आधारित फिल्म से एक बार फिर निर्देशन में हाथ आजमाने जा रहे है। यह फिल्म आजमगढ़ के एक ऐसे शख्स के जीवन पर अधारित है जिसे खुद को जिंदा साबित करने के लिए क्या क्या नहीं किया। उसने न केवल अपरहण जैसा संगीन जुर्म किया पड़ा बल्कि उसने विधानसभा में घुसकर पर्चा फेका और राजीव गांधी तथा विश्वनाथ पताप सिंह और कांशीराम के खिलाफ भी चुनाव लड़ा। सारी कोशिश महज इसलिए की एकबार उसका नाम थाने या चुनाव आयोग में जीवित व्यक्ति रूप में दर्ज हो जाये। 15 साल के संघर्ष के बाद उसे सरकारी अभिलेखों में जिंदा किया गया। बात हो रही है अखिल भारतीय मृतक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालबिहारी उर्फ मृतक की। मूल रुप से आजमगढ़ जनपद के निजामाबाद तहसील क्षेत्र के खलीलाबाद गांव के रहने वाले हैं। बचपन में ही पिता की मौत के बाद वे सदर तहसील क्षेत्र के अमिलो मुबारकपुर स्थित अपने ननिहाल में रहने चले गये थे। इसका फायदा उठाकर उनके चचेरे भाई व पट्टीदारों ने अभिलेखों में मृत घोषित कराकर सारी सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया। 30 जुलाई 1976 को अभिलेखों में मृत घोषित किये गये। इसका पता तब चला की वह मर चुके हैं जब वर्षो बाद वह बैंक से लोन लेने के लिए अपने कागजात निकलवाने गए। इसके बाद उन्होंने लम्बा संघर्ष किया जब खुद को जिंदा साबित नहीं कर सके तो 1988 में इलाहाबाद संसदीय सीट से पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह व बसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कांशीराम के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर गये। इसके बाद भी बात नहीं बनी तो वर्ष 1989-90 में अमेठी से राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा। दोनों ही चुनाव में इन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 1992 में आजमगढ़ की मुबारकपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़े। यह अलग बात है कि किसी भी चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके पूर्व 9 सितम्बर 1986 को खुद को जिंदा साबित करने के लिए मृतक ने विधानसभा में पर्चा फेंका था। इसके बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिल पाया। मजबूर होकर मृतक ने नया हथकंडा अपनाया और निजामाबाद एसओ को खुद को 151 धारा में जेल भेजने के लिए 500 रुपये घूस देने पहुंच गये लेकिन जब एसओ को पता चला कि लालबिहारी अभिलेख में मृतक हैं तो उसने भी पल्ला झाड़ लिया। यही नहीं इसी दौरान मृतक ने इस उम्मीद से अपने चचेरे भाई का अपहरण कर लिया कि शायद पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दे लेकिन पुलिस ने उसे बरामद तो किया किंतु मृतक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। मृतक ने और कागज़ी मृतकों को लेकर विधानसभा के सामने अपना अंतिम तक कर डाला था। लम्बी लड़ाई के बाद 30 जून 1994 को लालबिहारी अभिलेखों में जिंदा किये गये। इसके बाद लालविहारी ने मृतक संघ का गठन किया और अब तक संघर्ष के जरिये दो दर्जन से अधिक मृतकों का अभिलेख में जिंदा करा चुके है। मृतक को इस संघर्ष के लिए कई सम्मान भी हासिल हुए। 2003 में फिल्म निर्माता सतीश कौशिक मृतक के जीवन पर फिल्म बनाने के लिए उनसे मिले। वर्ष 2004-05 में उन्होंने फिल्म बनाने का अधिकार खरीद लिया। तभी से लालबिहारी के जीवन पर आधारित फिल्म बनाने के लिए स्क्रिप्ट पर काम चल रहा था। अब स्किप्ट का काम पूरा होने को है। स्वयं कौशिक ने दो दिन पूर्व इस बात का खुलासा किया कि उनकी अगली फिल्म लालबिहारी मृतक के जीवन पर आधारित होगी और इसकी शूटिंग सितंबर के अंत में या फिर अक्टूबर माह में शुरू कर दी जायेगी। लालबिहारी "मृतक" के जीवन पर फिल्म बनाएंगे सतीश कौशिक
आजमगढ़ : कई हिट फिल्मों के निर्माता सतीश कौशिक सच्ची घटना पर आधारित फिल्म से एक बार फिर निर्देशन में हाथ आजमाने जा रहे है। यह फिल्म आजमगढ़ के एक ऐसे शख्स के जीवन पर अधारित है जिसे खुद को जिंदा साबित करने के लिए क्या क्या नहीं किया। उसने न केवल अपरहण जैसा संगीन जुर्म किया पड़ा बल्कि उसने विधानसभा में घुसकर पर्चा फेका और राजीव गांधी तथा विश्वनाथ पताप सिंह और कांशीराम के खिलाफ भी चुनाव लड़ा। सारी कोशिश महज इसलिए की एकबार उसका नाम थाने या चुनाव आयोग में जीवित व्यक्ति रूप में दर्ज हो जाये। 15 साल के संघर्ष के बाद उसे सरकारी अभिलेखों में जिंदा किया गया। बात हो रही है अखिल भारतीय मृतक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालबिहारी उर्फ मृतक की। मूल रुप से आजमगढ़ जनपद के निजामाबाद तहसील क्षेत्र के खलीलाबाद गांव के रहने वाले हैं। बचपन में ही पिता की मौत के बाद वे सदर तहसील क्षेत्र के अमिलो मुबारकपुर स्थित अपने ननिहाल में रहने चले गये थे। इसका फायदा उठाकर उनके चचेरे भाई व पट्टीदारों ने अभिलेखों में मृत घोषित कराकर सारी सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया। 30 जुलाई 1976 को अभिलेखों में मृत घोषित किये गये। इसका पता तब चला की वह मर चुके हैं जब वर्षो बाद वह बैंक से लोन लेने के लिए अपने कागजात निकलवाने गए। इसके बाद उन्होंने लम्बा संघर्ष किया जब खुद को जिंदा साबित नहीं कर सके तो 1988 में इलाहाबाद संसदीय सीट से पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह व बसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कांशीराम के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर गये। इसके बाद भी बात नहीं बनी तो वर्ष 1989-90 में अमेठी से राजीव गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा। दोनों ही चुनाव में इन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 1992 में आजमगढ़ की मुबारकपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़े। यह अलग बात है कि किसी भी चुनाव में उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके पूर्व 9 सितम्बर 1986 को खुद को जिंदा साबित करने के लिए मृतक ने विधानसभा में पर्चा फेंका था। इसके बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिल पाया। मजबूर होकर मृतक ने नया हथकंडा अपनाया और निजामाबाद एसओ को खुद को 151 धारा में जेल भेजने के लिए 500 रुपये घूस देने पहुंच गये लेकिन जब एसओ को पता चला कि लालबिहारी अभिलेख में मृतक हैं तो उसने भी पल्ला झाड़ लिया। यही नहीं इसी दौरान मृतक ने इस उम्मीद से अपने चचेरे भाई का अपहरण कर लिया कि शायद पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दे लेकिन पुलिस ने उसे बरामद तो किया किंतु मृतक के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। मृतक ने और कागज़ी मृतकों को लेकर विधानसभा के सामने अपना अंतिम तक कर डाला था। लम्बी लड़ाई के बाद 30 जून 1994 को लालबिहारी अभिलेखों में जिंदा किये गये। इसके बाद लालविहारी ने मृतक संघ का गठन किया और अब तक संघर्ष के जरिये दो दर्जन से अधिक मृतकों का अभिलेख में जिंदा करा चुके है। मृतक को इस संघर्ष के लिए कई सम्मान भी हासिल हुए। 2003 में फिल्म निर्माता सतीश कौशिक मृतक के जीवन पर फिल्म बनाने के लिए उनसे मिले। वर्ष 2004-05 में उन्होंने फिल्म बनाने का अधिकार खरीद लिया। तभी से लालबिहारी के जीवन पर आधारित फिल्म बनाने के लिए स्क्रिप्ट पर काम चल रहा था। अब स्किप्ट का काम पूरा होने को है। स्वयं कौशिक ने दो दिन पूर्व इस बात का खुलासा किया कि उनकी अगली फिल्म लालबिहारी मृतक के जीवन पर आधारित होगी और इसकी शूटिंग सितंबर के अंत में या फिर अक्टूबर माह में शुरू कर दी जायेगी।


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