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विशेष:: होली- लोक, उप-शास्त्रीय एवं शास्त्रीय संगीत -डॉ निशा सिंह यादव

लेखिका - डॉ निशा सिंह यादव श्री अग्रेसेन महिला स्नात्कोत्तर कालेज आजमगढ़ में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। 

हमारा देश जहां खेतो का खलिहानों का, धर्मो का और ऋतुओं का देश है, वहीं इसे लोक गीतों का देश भी कहा जा सकता है। जन-जीवन का तो जन्म से लेकर मरण तक कोई भी क्षेत्र ऐसा नही, जो गीतों से दूर हो। धरती पर निरन्तर लोक गीत झूमते रहते है, जैसे सावन भर कजरी गायी जाती है तो उसी तरह फागुन भर फाग-राग की धूम रहती है। 
व्रत और त्यौहार हमारी संस्कृति की आधारशीला है, इनमें हमारी संस्कृति की विकास गाधा है। किसी विशेष घटना को लोक मानस के हृदय पर स्थायी रूप से अंकित करने में ये त्यौहार सहायक होते है। ये हमें कुछ समय के लिए आपसी भेद-भाव भुलाकर प्रेम के रंग में रंग देते है। त्यौहार हमारें सामाजिक जीवन के चित्र है। इनका मार्ग प्रेम का है, ये जीवन के लौकिक आधार है। त्यौहारों के रीति-रिवाज मानव कल्याण के प्रतीक है।
भारत पर्व प्रधान देश है। त्योहारों की दृष्टि से देखा जाय तो होली के त्यौहार की मस्ती छेड़-छाड़ सबसे ज्यादा उर्जावान और आनन्दित करती है। इसके अतिरिक्त धर्म और आध्यात्म प्रधान भारत में होली का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि इसका सम्बन्ध राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं से रहा है। बरसाने की लठमार होली प्रसिद्व है।
मुगल सम्राटो ने भी उत्सुकता पूर्वक इस त्योहार का स्वागत किया। अकबर की राजधानी ब्रज क्षेत्र है। ब्रज की होली देश भर में सदा से प्रसिद्ध रही है। राजा और रंक का अन्तर दूर कर देना, अत्यन्त गंभीर मुद्रा धारण करने वाले सज्जनों को भी अटटाहस करते हुए बदल देना, मस्ती से भरे हुए एक रंगीन वातावरण की सृष्टि करना होली की विशेषता है। तानसेन, उनके वंशजों ओर शिष्यों ने भी धमारों की रचना की और लोक-गीति का यह प्रकार ,धमार एक विशेष रूप धारण करके मुगल दरबार में प्रतिष्ठित हुआ।
धमार संगीत का एक अत्यन्त प्राचीन अंग है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा सम्बन्ध है। धमार गीतों में ब्रज की होली का वर्णन रहता है। जिसमें भगवन श्री कृष्ण गोपियों के साथ होली खेलते दिखाये जातें है। इसे धमार ताल में गाते है। जो 14 मात्रा में होती है। धमार में दुगुन, चौगुन आदि लयकारियां अधिकतर गीत के शब्दों को लेकर दिखाई जाती है। इसमें गमक का खूब प्रयोग होता है। धमार गीत के साथ पखावज बजाया जाता हैं, किन्तु आधुनिक काल में पखावज का प्रचार कम होने तथा तबले का प्रयोग अधिक होने अब धमार गीत के साथ तबले का प्रयोग होने लगा है। राग जयजयवन्ती में एक धमार---
आज छबीले मोहन नगार, बृज में खेलत होरी।
ग्वाल-बाल सब संग सखा, रंग गुलाल की होरी।।
धमार में भाव का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है इसमें विशेष रूप से होली का वर्णन होता है। ध्रुपद, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली गीतों का सन्दौर्य देखते ही बनता है। कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुन्दर बंदिशे आज भी अत्यन्त लोकप्रिय है-
चलो गुंइयां आज खेले होरी कन्हैया घर। इसी प्रकार ध्रुपद में भी होली के सुन्दर वर्णन मिलते है।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे है जिनमें होली के गीत विशेष रूप् से गाये जाते है। जैसे राग बसन्त, राग बहार, राग हिंडोल और राग काफी ऐसे ही राग है। बसन्त राग पर आधारित बंदिश---
‘फगवा ब्रज देखने को चलो रे, फगवे मे मिलेगें, कुॅवर का।
राग बहार पर आधारित-
‘‘ छमछम नाचत आई बहार‘‘
राग काफी पर आधारित -
‘‘आज खेलो शाम संग होरी, पिचकारी रंग भरी सोहत री‘‘ प्रसिद्ध बंदिशे है।
होली पर गाने बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है। और जन-जन पर इसका रंग छाने लगता है।
उप शास्त्रीय संगीत में चैती, दादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियां है। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली है, जिसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा होता है। जहां ब्रज में राधा कृष्ण के होली खेलने का वर्णन मिलता है। जैसे - ‘ आज बिरज में होली रे रसिया, होरी रे रसिया, बरजोरी रे रसिया  वहीं अवध में राम और सीता के - ‘ होली खेले रघुवीरा अवध में होली खेले रघुवीरा‘ । राजस्थान के अजमेर शहर में ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ची की दरगाह पर गाई जाने वाली एक विशेष होली है। ‘ आज रंग है री मन रंग है, अपने महबूब के घर रंग है री‘ । ख्वाजा मोइउद्दीन ने होली को विशेष महत्व दिया है। कहते हे कि वे खुद भी होली खेला करते थे। उनकी भक्ति में जो कव्वालियां गायी जाती है , उसमें भी रंगों का उल्लेख आता है।
इसी प्रकार शंकर जी से सम्बन्धित एक होली में ‘दिगम्बर खेले मसाने में होली ‘ शिव द्वारा श्मशान में होली खेलने का वर्णन मिलता है। 
इसी तरह रंग और संगीत चोली दामन की तरह एक दुसरे से जुड़े हुए है। उनका असर मन पर कैसे और किस हद तक होता है, यह होली के त्योहार में दिखायी देता है, मन की खुशी, प्रेम, उमंग, तरंग इन सब भावों को अभिव्यक्त करने के लिए रंग और संगीत होली के त्योहार का अनोखा माध्यम बन जाते है। लोग अपने मन के दुःख और द्वेष भाव को मिटाकर रंगों की दुनिया में सुर और ताल के संग अपने आप को डूबो लेते है। चारों तरफ खुशी प्यार और अपने पन का एक अलग वातावरण बन जाता है। रंग मन के भावों को अभिव्यक्त करते है। संगीत जीवन की साधना है, और इन दोनों के समन्वय की मिसाल है होली का बेमिसाल त्यौहार।
इस प्रकार हम देख पाते है कि होली मनुष्य की आत्मिक उद्गार की वह बेला है जो उसके संप्रेषण में मनुष्य द्वारा निर्मित सामाजिक, धार्मिक, भौगोलिक सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए आत्मिय संवाद स्थापित करती है। चाहे वह होली का लोक रंग हो या उप-शास्त्रीय संगीत हो अथवा परिस्कृत अभिजात्य शास्त्रिय संगीत। 

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रिपोर्ट आज़मगढ़ लाइव

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