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आली संस्था ने राष्ट्रीय एकता एंव सामाजिक सौहार्द पर एक कवि सम्मेलन एंव मुशायरा का आयोजन किया

 
आजमगढ़ः रविवार की शाम को एसोसिएशन फॅार एडवोकेसी एण्ड लीगल इनिशिएटिव्स (आली) संस्था एंव जागरूक नागरिक मंच के तत्वाधान में श्री मंगलम होटल, सिधारी आजमगढ़ में राष्ट्रीय एकता एंव सामाजिक सौहार्द पर एक कवि सम्मेलन एंव मुशायरा का आयोजन किया गया। कवि सम्मेलन की थीम एक शाम राष्टीय एकता एंव सामाजिक सौहार्द के नाम रहा। 
आगे सालिम दाउदी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहां कि जो जम्मू कशमीर और ऊरी में जो घटना हुई है उसकी हम निंदा करते है। भारत ऋषियों व सूफी सन्तो का देश है भारत ने पूरी दूनिया में अमन एंव शांति का संदेश दिया है कोई भी देश हमारे सब्र का इम्तहान न ले।
कवि सम्मेलन का संचालन डा0 ईश्वर चन्द्र त्रिपाठी ने किया, इसी क्रम में निम्नांकित कवि व शायर ने सामाजिक सौहार्द पर शायरी व कविता के माध्यम से व्यक्त किया-
शायर ताज आजमी -देश की खातिर मरना जीना सबके बस की बात नही। हंसते हुए फांसी पर चढ़ना सबके बस की बात नही।।
कवि विनम्र सेन सिंह ने अपनी बात कविता के माध्यम से व्यक्त करते हुए कहा कि ” सुखिया के मन में अब एक ही उदासी है। उसके घर हरि ने एक बिटिया तराशी है।।
डा0 सोनी पांडेय- मेरी प्रतिदिन भेंट होती है चौराहे से। चेहरा दिखाता है आईना मुझे मेरे समाज का।।
डा0 ईश्वर चन्द्र त्रिपाठी - सत्य पर आवरण नही होता, वक्त का आचरण नही होता। आॅशुओं ने बताया आंखो को, दर्द का व्याकरण नही होता।।
कवि राजा राम सिंह- जनतंत्र का अर्थ शब्द कोश में नही। वाद विवाद छात्र और नेताओं के जोश में नही।।
इस कवी सम्मेलन में बैजनाथ गवार, सरफराज नवाज, आशा सिंह,बृजेश यादव,सुरेश सिंह चांद ने अपनी रचानाऐं पढ़ी।
इस अवसर पर अरून सिंह एडवोकेट, मसरूद्दीन संजरी , संतोष यादव, आरिफ नसीम,कौशर पठान, सुफियान अहमद, डा0 प्रवेश सिंह,राजीव त्रिपाठ लीला यादव, कनिज फातमा इसके अतिरिक्त सैकड़ो श्रोता उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता शिबली कालेज के लेक्चरर डा0 बाबर अशफाक ने किया व कार्यक्रम का समापन और धन्यवाद तारिक शफिक ने किया।


सम्मेलन में आली की कार्यक्रम समन्वयक अंशुमाला सिंह ने आली के परिचय के साथ-साथ सभी का स्वागत किया तथा कवि सम्मेलन एंव मुशायरा के उद्देश्य से परिचित कराते हुए बताया कि हमेशा से ही साहित्य एंव संस्कृति का सामाजिक आन्दोलन में गहरा सम्बन्ध रहा है। आज के वर्तमान परिदृष्य में जिस प्रकार से साम्प्रदायिक हिंसा बढ़ी है और समाज को बांटने वाली गतिविधियों को स्वीकार्यता मिलती जा रही है उसमे जरूरी हो जाता है कि उसके खिलाफ साहित्यकार खासकर शायर व कवि अपनी भूमिका निभायें। इतिहास गवाह है कि कलम ने वो कुछ करके दिखाया है जो हथियार व हिंसा से कर पाना सम्भव नही था। इसका चमत्कार यह है कि यह दिलों को जितता है और इसके संघर्ष में हारने वाला कोई नही होता। 

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रिपोर्ट आज़मगढ़ लाइव

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